Friday, July 8, 2011

For Mr. Harish Tripathi...on his Pic...

प्रकृति की इस मनोहर...छटा को देखकर मेरा मन कुछ यूँ कहता है...
बादलों का संग पवन ने, आज फिर से पा लिया..
वृक्ष शाखाओं ने जैसे, नृत्य कर सब पा लिया..
मेघ ने देखो वहां, शीतल सा जल बरसा दिया....
शुष्क, रुष्ठ पत्थरों का, मन हरित सा कर दिया....
सूर्य भी बादल की चादर, ओढ़ के है छुप गया..
मन मेरा इन बादलों के, बीच जाकर बस गया.....
वहीँ बस गया...वहीँ रह गया......

Thursday, July 7, 2011

For Pratibimb Ji....

प्रतिबिम्ब जी...
इस बेहद खूबसूरत प्रभावित करने वाले देश भक्ति गीत में २ शब्दों का आक्रोश मेरी तरफ से भी...



उन गैर मुल्क दुश्मनों की, जान तुमने ली भली, 
पर आंधियाँ इस देश में, अब तक नहीं हैं क्यों टली, 
कर सर कलम तू द्रोह का, जन-जन तेरी आवाज़ हो...
जन-जन तेरी आवाज़ हो...
वतन की राह में, क्यों जवान ही शहीद हो....
क्यों जवान ही शहीद हो...
इस मुल्क की हर एक साँस, शहीद की मुरीद हो...
वतन की राह में, क्यों जवान ही शहीद हो......

Monday, June 27, 2011

For Ms. Deepti Pant, (Dhoondhte Dhoondhte Khuda Mil Gaya) - Reply

कैसा दिखता है,
क्या किसी पत्थर सा,
या किसी पेड़ सा,
या शायद टंगा होगा किसी कागज़ सा,
क्या उसके घर पर,
पांच वक़्त की अज़ान थी,
या फिर घंटियों की आवाज़ से,
पहाड़ों की चोटियाँ गुंजायमान थी,
कैसा लगा उसका चेहरा,
क्या किसी अबोध सा था,
या फिर चेहरे से उसके,
मानवता का बोध सा था....
उसकी रसोई देखी ?,
क्या वहां छप्पन भोग थे,
ये फिर थी सिर्फ दाल-रोटी,
क्या वो गरीब था, असहाय था,
या फिर चेहरे से उसके टपकती,
अमीरी का दर्प सुखाय था,
क्या वो सचमुच भगवान् था....
या रखा तुमने कोई आइना सरे बाज़ार था....
किंचित......
SURYADEEP ANKIT TRIPATHI - 27/06/2011

Monday, June 20, 2011

FOR MS. SUNITA BHASKAR..... DARD... (CANCER)

सचमुच... बहुत ही..दर्द सहते हैं.... जिन्हें ये बीमारी...लग जाती है...उनका हर पल हर लम्हा... कई पलों में, कई लम्हों में बदल जाता है... उनकी मुस्कराहट में भी दर्द का इल्म होता है, और कई बार वो हँसना चाहते हैं, लेकिन कमबख्त आँखों का पानी बहकर, उनकी मुस्कराहट को, उनकी हंसी को दर्द में तब्दील कर देती है....

रही तेरी नज़र सलामत, तो नज़र आऊँगा मैं भी,
गया जो घर से गुजर तू, तो गुज़र जाऊँगा मैं भी !!
जिन्दगी जिन्दा है दर्दों की दवा कर-कर के,
अब तो लगता है, एक दर्द से मर जाऊँगा मैं भी !!
कई नश्तर मेरे सीने में दफ़न है अब तक,
आज का जख्म भी मिल जाए, तो घर जाऊँगा मैं भी !!
मेरे मालिक, तू रहम करके, बुलाले मुझको,
जिस्म पर दाग ये लेकर के, किधर जाऊँगा मैं भी !! 



DARD... BY SURYADEEP ANKIT TRIPATHI - 20/06/2011

Saturday, May 21, 2011

for Ms. सुनीता भास्कर.... about the partition...विभाजन - 20/05/2011

विभाजन... कभी ख़ुशी नहीं देता...चाहे वो एक परिवार का हो, एक समाज का, समुदाय का या फिर एक देश का...इसके लिए जिम्मेदार.... हमेशा से राजनीती ही रहेगी...और रहेंगे वो राजनेता, जिनमें दूरगामी फैसले लेने की कमी थी,
और निज स्वार्थ ही जिनके लिए उस समय सर्वोपरि था. एक होड़ थी कुछ गिने चुने लोगों में अपना वर्चस्व साबित करने की, लोगों में अलगाव या साम्प्रदायिकता का जहर घोला जा रहा था.. उन्हें जान बूझ कर साम्प्रदायिकता की आग में झोंका गया था, ताकि लोगों में अलगाव की स्तिथि पैदा हो, और राजनेता एक पृथक देश की मांग कर सके.. क्योंकि जिस प्रकार से एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती, उसी प्रकार अब एक देश में दो प्रमुखों का होना उन राजनेताओं को स्वीकार नहीं था...

Sunday, May 15, 2011

for Mr. Kamlesh Upreti....- Doordarshan... 16/05/2011

सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर है....
पर आज सत्यता और सुन्दरता के मायने बदल गए हैं... दूरदर्शन एक मर्यादित राम है, जिसे अपनी प्रस्तुति को सीमित एवं संतुलित रखना होता है और केबल टी. बी. अपने अनेकों चैनल रुपी सरों के साथ आज आपके घर के भीतर तक आ गया है. जहाँ सत्यता को स्वार्थ रुपी मुखौटा ओढ़ कर दिखाया जाता है, और सुन्दरता केवल २ कपड़ों तक ही सीमित रह गई है....और शिव अंतर्ध्यान हैं..

Friday, April 29, 2011

for Ms. Kiran Meetu Srivatava.... - 30/04/2011

कई दिन हुए, तुम्हें यूँ ही उदास देखता हूँ मैं...
क्या अब भी तेरे ख्यालों में, आया करता हूँ मैं...
कहा था, ये दिल मत लो, परेशां खुद मैं इससे,  
क्या दर्द बन, अब भी तुम्हें रुलाया करता हूँ मैं....
सुर्यदीप - ३०/०४/२०११