Saturday, May 21, 2011

for Ms. सुनीता भास्कर.... about the partition...विभाजन - 20/05/2011

विभाजन... कभी ख़ुशी नहीं देता...चाहे वो एक परिवार का हो, एक समाज का, समुदाय का या फिर एक देश का...इसके लिए जिम्मेदार.... हमेशा से राजनीती ही रहेगी...और रहेंगे वो राजनेता, जिनमें दूरगामी फैसले लेने की कमी थी,
और निज स्वार्थ ही जिनके लिए उस समय सर्वोपरि था. एक होड़ थी कुछ गिने चुने लोगों में अपना वर्चस्व साबित करने की, लोगों में अलगाव या साम्प्रदायिकता का जहर घोला जा रहा था.. उन्हें जान बूझ कर साम्प्रदायिकता की आग में झोंका गया था, ताकि लोगों में अलगाव की स्तिथि पैदा हो, और राजनेता एक पृथक देश की मांग कर सके.. क्योंकि जिस प्रकार से एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती, उसी प्रकार अब एक देश में दो प्रमुखों का होना उन राजनेताओं को स्वीकार नहीं था...

Sunday, May 15, 2011

for Mr. Kamlesh Upreti....- Doordarshan... 16/05/2011

सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर है....
पर आज सत्यता और सुन्दरता के मायने बदल गए हैं... दूरदर्शन एक मर्यादित राम है, जिसे अपनी प्रस्तुति को सीमित एवं संतुलित रखना होता है और केबल टी. बी. अपने अनेकों चैनल रुपी सरों के साथ आज आपके घर के भीतर तक आ गया है. जहाँ सत्यता को स्वार्थ रुपी मुखौटा ओढ़ कर दिखाया जाता है, और सुन्दरता केवल २ कपड़ों तक ही सीमित रह गई है....और शिव अंतर्ध्यान हैं..

Friday, April 29, 2011

for Ms. Kiran Meetu Srivatava.... - 30/04/2011

कई दिन हुए, तुम्हें यूँ ही उदास देखता हूँ मैं...
क्या अब भी तेरे ख्यालों में, आया करता हूँ मैं...
कहा था, ये दिल मत लो, परेशां खुद मैं इससे,  
क्या दर्द बन, अब भी तुम्हें रुलाया करता हूँ मैं....
सुर्यदीप - ३०/०४/२०११ 

Monday, April 25, 2011

For Mr. Mahohar Chamoli.. - Tanaav aur Uljhan....

"तनाव की नाव बिना पतवार की बहती हुई होती है.. वो कहाँ जायेगी, कितना जाएगी....और कहाँ जाकर ठहरेगी....ये तो उलझनों से बहती हवा को महसूस करके ही बताया जा सकता है... उलझनों की हवा जितनी तेज़ होगी...तनाव की नाव...उतना ही भटकेगी और...अंत में शून्य रुपी भंवर में समाकर विलुप्त हो जाएगी... उपाय..... कभी भी उलझनों से न उलझो....बस !!!"  - suryadeep ankit tripathi - 25/04/2011


Monday, April 18, 2011

for DDN .. Sai baba..

साईं चरन रज, मिटे कलेशा,
मम वन्दन, इन युगल चरन को,
बलिहारी, जो पाऊँ, चरण रज
धन्य करूँ इस जीवन को  - 29/12/2010

Sunday, April 17, 2011

maa ....... for Mr. Pravesh - 18/04/2011

वो झपकियाँ, वो थपकियाँ, 
वो आधी-अधूरी नींद का, एक ख्वाब सुनहरा..
वो लोरियां, वो कहानियाँ, 
वो गोद में रख के सर, ढक लेना आँचल से, 
वो पा की झिडकियां, वो कैद सी खिड़कियाँ, 
वो डांट से सहम के, चिपक के रोना फिर तुझसे,
वो प्यार तेरा, दुलार तेरा, 
वो अपना न खाकर, मुझको खिलाना प्यार से, 
अहसास ये, न जाने किस पल खो गया,
बचपन छोड़ कर, क्यों जवान मैं हो गया....
क्यों जवान मैं हो गया.......
सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी - १८/०४/२०११  

Friday, April 15, 2011

for Pagalkhana - Pratibimb ji.... ham paagal hain...

हम पागल हैं, तुम पागल हो, 
पागल ये सारा ज़माना है, 
दर्द नहीं, तकलीफ नहीं जहाँ, 
ऐसा इक प्यारा कोना है ,, 
भिन्न- भिन्न हैं लोग यहाँ पर, 
भिन्न - भिन्न हैं टोलियाँ, 
पर जब सब मिल यहाँ हैं जाते, 
करते हंसी, ठिठोलियाँ,
एक दूजे की टांग ये खींचे, 
एक दूजे के बाल भी,
पागलपंती करे ये थोड़ी, 
थोड़ी प्यार संभाल भी, 
हम पागल हैं, तुम पागल हो, 
पागल ये सारा ज़माना है, 
दर्द नहीं, तकलीफ नहीं जहाँ, 
ऐसा इक प्यारा कोना है ,, 
सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी - १७/०४/२०११